फणीश्वरनाथ रेणु
#04march
#11april
फणीश्वरनाथ रेणु
🎂04 मार्च 1921
अररिया, बिहार, भारत
मौत
⚰️11 अप्रैल 1977
पेशा
उपन्यासकार, कहानीकार, संस्मरणकार
उल्लेखनीय कामs
मैला आँचल
जीवनसाथीs
रेखा, पद्मा और लतिका रेणु
बच्चे
कविता रॉय ,पद्म पराग वेणु, नवनीता, अपरजीत, दक्षिणेश्वर प्रसाद राय, वहीदा रॉय
रिश्तेदार
शीला नाथ मंडल
फणीश्वर नाथ "रेणु"
एक सुप्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार थे। हिन्दी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण रचनाकार फणीश्वरनाथ 'रेणु' का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िला के 'औराही हिंगना' गांव में हुआ था। रेणु के पिता शिलानाथ मंडल संपन्न व्यक्ति थे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में उन्होंने भाग लिया था। रेणु के पिता कांग्रेसी थे। रेणु का बचपन आज़ादी की लड़ाई को देखते समझते बीता। रेणु ने स्वंय लिखा है - पिताजी
किसान थे और इलाके के स्वराज आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता। खादी पहनते थे, घर में चरखा चलता था। स्वाधीनता संघर्ष की चेतना रेणु में उनके पारिवारिक वातावरण से आयी थी। रेणु भी बचपन और किशोरावस्था में ही देश की आज़ादी की लड़ाई से जुड़ गए थे।1930-31 ई. में जब रेणु 'अररिया हाईस्कूल' के चौथे दर्जे में पढ़ते थे तभी महात्मा गाँधी की
गिरफ्तारी के बाद अररिया में हड़ताल हुई, स्कूल के सारे छात्र भी हड़ताल पर रहे। रेणु ने अपने स्कूल के असिस्टेंट हेडमास्टर को स्कूल में जाने से रोका। रेणु को इसकी सज़ा मिली लेकिन इसके साथ ही वे इलाके के बहादुर सुराजी के रूप में प्रसिद्ध हो गए
रेणु की प्रारंभिक शिक्षा 'फॉरबिसगंज' तथा 'अररिया' में हुई। रेणु ने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मैट्रिक नेपाल के 'विराटनगर' के 'विराटनगर आदर्श विद्यालय' से कोईराला परिवार में रहकर किया। रेणु ने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में किया और उसके बाद वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1950 में रेणु
ने 'नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन' में भी भाग लिया
फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में छ्पी।1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम
फ़िल्म_तीसरी_क़सम'
उनकी कहानी 'मारे गए गुलफ़ाम' पर आधारित फ़िल्म 'तीसरी क़सम' ने भी उन्हें काफ़ी प्रसिद्धि दिलवाई। इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका में अभिनय किया था। 'तीसरी क़सम' को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। कथा-साहित्य के अलावा उन्होंने संस्मरण , रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा। उनके कुछ संस्मरण भी काफ़ी मशहूर हुए।
'ऋणजल धनजल', 'वन-तुलसी की गंध', 'श्रुत अश्रुत पूर्व', 'समय की शिला पर', 'आत्म परिचय' उनके संस्मरण हैं। इसके अतिरिक्त वे 'दिनमान पत्रिका' में रिपोर्ताज भी लिखते थे। 'नेपाली क्रांति कथा' उनके रिपोर्ताज का उत्तम
उदाहरण है।
मैला_आंचल
'रेणु' जी का 'मैला आंचल' वस्तु और शिल्प दोनों स्तरों पर सबसे अलग है। इसमें एक नए शिल्प में ग्रामीण-जीवन को चित्रित किया गया है। इसकी विशेषता है कि इसका नायक कोई व्यक्ति (पुरुष या महिला) नहीं वरन पूरा का पूरा अंचल ही इसका नायक है। मिथिलांचल की पृष्ठभूमि पर रचे इस उपन्यास में उस अंचल की भाषा विशेष का अधिक से अधिक प्रयोग किया गया है। यह प्रयोग इतना सार्थक है कि वह वहां के लोगों की इच्छा-आकांक्षा, रीति- रिवाज़, पर्व-त्यौहार, सोच-विचार, को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के सामने उपस्थित करता है। इसकी भूमिका, 9 अगस्त 1954, को लिखते हुए फणीश्वरनाथ 'रेणु' कहते हैं, 'यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास। इस उपन्यास के केन्द्र में है बिहार कापूर्णिया ज़िला , जो काफ़ी पिछड़ा है।' रेणु कहते हैं, इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है,
गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी,
सुंदरता भी है, कुरूपता भी – मैं
किसी से दामन बचाकर नहीं निकल
पाया
रेणु की कुल 26 पुस्तकें हैं। इन पुस्तकों में संकलित रचनाओं के अलावा भी काफ़ी रचनाएँ हैं जो संकलित नहीं हो पायीं, कई अप्रकाशित आधी अधूरी रचनाएँ हैं। असंकलित पत्र पहली बार 'रेणु रचनावली' में शामिल किये गये हैं
साहित्यिक_कृतियां
उपन्यास
मैला आंचल 1954
परती परिकथा 1957
जूलूस 1965
दीर्घतपा 1964 (जो बाद में कलंक मुक्ति
(1972) नाम से प्रकाशित हुई)
कितने चौराहे 1966
पल्टू बाबू रोड 1979
कथा_संग्रह
आदिम रात्रि की महक 1967
ठुमरी 1959
अगिनखोर 1973
अच्छे आदमी 1986
संस्मरण
आत्म परिचय
समय की शिला पर
रिपोर्ताज
ऋणजल धनजल 1977
नेपाली क्रांतिकथा 1977
वनतुलसी की गंध 1984
एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984
श्रुत अश्रुत पूर्व 1986
प्रसिद्ध_कहानियां
मारे गये गुलफाम
एक आदिम रात्रि की महक
लाल पान की बेगम
पंचलाइट
तबे एकला चलो रे
ठेस
संवदिया
ग्रंथावली
फणीश्वरनाथ रेणु ग्रंथावली
प्रकाशित_पुस्तकें
वनतुलसी की गंध 1984
एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984
श्रुत अश्रुत पूर्व 1986
अच्छे आदमी 1986
एकांकी के दृश्य 1987
रेणु से भेंट 1987
आत्म परिचय 1988
कवि रेणु कहे 1988
उत्तर नेहरू चरितम् 1988
फणीश्वरनाथ रेणु: चुनी हुई रचनाएँ 1990
समय की शिला पर 1991
फणीश्वरनाथ रेणु अर्थात् मृदंगिये का मर्म
1991
प्राणों में घुले हुए रंग 1993
रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ 1992
चिठिया हो तो हर कोई बाँचे (यह पुस्तक
प्रकाश्य में है)
अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
निधन
रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन करते हुए जेल गये। रेणु ने आपातकाल का विरोध करते हुए अपना 'पद्मश्री' का सम्मान भी लौटा दिया। इसी समय रेणु ने पटना में 'लोकतंत्र रक्षी साहित्य
मंच' की स्थापना की। इस समय तक रेणु को 'पैप्टिक अल्सर' की गंभीर बीमारी हो गयी थी। लेकिन इस बीमारी के बाद भी रेणु ने 1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया। 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी 'पैप्टिक अल्सर' की बीमारी के कारण चल बसे
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