ललिता पवार

#18april 
#24feb 
ललिता पवार 

🎂18 अप्रैल , 1916

⚰️24 फरवरी ,1998

पति: राज कुमार गुप्ता (विवा. ?–1998), गणपतराव पवार

बच्चे: जय पवार
माता-पिता: लक्ष्मण राव शगुन
टीवी शो: रामायण, Sasural
हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। जिन्होंने अभिनय की यात्रा का सात दशक लंबा सफर तय किया। 
1942 में फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन में अभिनेता भगवान दादा को उन्हें जोरदार थप्पड़ मारना था. एक नए अभिनेता होने के नाते, उन्होंने गलती से ललिता को बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया था, जिसकी वजह से ललिता के चेहरे के एक साइड लकवा मार दिया और उनकी बाईं आंख की नस फट गई.


ललिता पवार 


🎂18 अप्रैल , 1916

⚰️24 फरवरी ,1998

पति: राज कुमार गुप्ता (विवा. ?–1998), गणपतराव पवार

बच्चे: जय पवार
माता-पिता: लक्ष्मण राव शगुन
टीवी शो: रामायण, Sasural
हिन्दी सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। जिन्होंने अभिनय की यात्रा का सात दशक लंबा सफर तय किया। 
1942 में फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन में अभिनेता भगवान दादा को उन्हें जोरदार थप्पड़ मारना था. एक नए अभिनेता होने के नाते, उन्होंने गलती से ललिता को बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया था, जिसकी वजह से ललिता के चेहरे के एक साइड लकवा मार दिया और उनकी बाईं आंख की नस फट गई.

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उन्होंने साल 1932 में आई एक मूक फिल्म 'कैलाश' में सह-निर्माण और अभिनय किया था. 1942 में फिल्म 'जंग-ए-आजादी' के एक सीन में अभिनेता भगवान दादा को उन्हें जोरदार थप्पड़ मारना था. एक नए अभिनेता होने के नाते, उन्होंने गलती से ललिता को बहुत जोर से थप्पड़ मार दिया था, जिसकी वजह से ललिता के चेहरे के एक साइड लकवा मार गया मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो तीन साल के इलाज के बाद, ललिता की बाईं आंख खराब हो गई थी. इस प्रकार उन्हें मुख्य भूमिकाएं छोड़नी पड़ीं, और साइड रोल में काम करना पड़ा, जिससे वह बाद में काफी मशहूर हो गई. बता दें, इस घटना से पहले वह फिल्मों में लीड एक्ट्रेस की भूमिका में नजर आया करती थीं, लेकिन बाद में फिल्म मेकर्स और डायरेक्टर उन्हें लीड रोल में लेने से इनकार कर दिया.कहा तो ये भी जाता है कि इलाज के कारण ललिता पवार को 3 सालों तक घर पर खाली बैठना पड़ा था और जब वह पर्दे पर वापसी कीं, तो उन्हें सिर्फ मां-बहन और सास के रोल ही मिलने लगे और फिर ललिता पवार सिर्फ कैरेक्टर रोल्स तक ही सिमट कर रह गईं, लेकिन कला एक ऐसी चीज है, जो आपको अपने मुकाम तक पहुंचा ही देती है. ललिता ने कैरेक्टर रोल करके जो स्टारडम हासिल की, वो शायद आज की लीड को भी बहुत मुश्किल से नसीब हो पाए.लेकिन, जिंदगी से ललिता की जंग यहीं नहीं खत्म हुई, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ललिता पवार की जिंदगी में दुखों का पहाड़ फिर टूटा और उनकी शादीशुदा जिंदगी तब तबाह हो गई जब उनकी पति फिल्ममेकर गणपत राव की अफेयर उनकी छोटी बहन के साथ शुरू हुई, फिर ललिता ने अपने पति से अलग हो गईं और बाद में, उन्हें कैंसर हो गया और कैंसर से जंग लड़ते-लड़ते उनकी सेहत धीरे-धीरे खराब होती चली गई और आखिरकार वह यह जंग हार गईं. 24 फरवरी 1998 को ललिता का निधन हो गया था.
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भारतीय नारी का जीवन जीते हुए

एक संजीदा कलाकार जिन्होंने सिनेमा को कई यादगार फ़िल्में दीं। ‘जंगली’ की सख्त मां, ‘श्री 420’ की केला बेचने वाली, ‘ आनंद’ की संवेदनशील मातृछवि और ‘अनाड़ी’ की मिसेज डिसूजा सहित अनेक चरित्रों की जीवंत छवियों को कैसे भूला जा सकता है। रामानन्द सागर द्वारा निर्मित 'रामायण' धारावाहिक में मंथरा की भूमिका को सजीव भी ललिता पवार ने ही बनाया था।

ललिता पवार (वास्तविक नाम: 'अंबा लक्ष्मण राव शागुन') ने नासिक के नाम से निकट येवले में 18 अप्रैल , 1916 को जन्म लिया। उन्होंने भारतीय सिनेमा में एक लंबा सफर तय किया। वे सिनेमा के आरंभिक दौर से लेकर आधुनिक समय

तक की दृष्टा और साक्षी थीं। मूक फ़िल्मों की मौन भाषा से लेकर बोलती फ़िल्मों के
वाचाल जादू के दौर को उन्होंने देखा। भारतीय सिनेमा को परवान चढ़ते देखा। इस विकास-क्रम का एक हिस्सा बनीं। स्त्री-जीवन के विविध आयामों को पर्दे पर निभाया। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक विभिन्न स्त्री-छवियों में ललिता घुल-मिल गईं। भारतीय नारी के हर एक चरित्र में ढल गईं। ललिता पवार हिंदी सिनेमा
में भारतीय नारी जीवन की एक महान
कलाकार थीं। इस क्रम में एक परंपरागत सास की छवि को उन्होंने इतना बखूबी निभाया कि यह उनकी पहचान ही बन गई

ललिता ने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल-कलाकार की तरह आर्यन फ़िल्म कंपनी के साथ की। मूक प्रोडक्शन वाली फ़िल्मों की मुख्य भूमिका वाले नारी-चरित्रों की भूमिकायें निभाता उनका फ़िल्मी सफर जारी रहा। उस समय फ़िल्मों में उनका स्क्रीन नाम 'अंबू' था।

मूक स्टंट फ़िल्म ‘दिलेर जिगर’ उनकी प्रारंभिक सफलतम फ़िल्मों में शुमार है, जिसे ललिता के पति जी.पी. पवार ने निर्देशित किया था। अवाक फ़िल्मों से बोलती फ़िल्मों की यात्रा में सहभागी रहीं ललिता ने टॉकी फ़िल्मों में भी कई मुख्य भूमिकायें निभाईं, जिनमें शामिल
हैं- ‘राजकुमारी’ (1938), ‘हिम्मत-ए-मर्द’ (1935) और ‘दुनिया क्या है’ (1937)। ‘दुनिया क्या है’ ललिता की ही निर्माण की हुई फ़िल्म थी

मुख्य भूमिकायें निभातीं ललिता पवार की किस्मत ने पलटा खाया और एक दुर्घटना ने उनका चेहरा बिगाड़ दिया और उनकी आंखों की रोशनी भी खराब हो गई। लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अभिनय का साथ नहीं छोड़ते हुये चरित्र-प्रधान रोल करने लगीं। फ़िल्म ‘रामशास्त्री’(1944) में अपनी खराब हो चुकी बायीं आंख का कलात्मक प्रयोग क्रूर और परंपरागत सास की भूमिका में किया। उनकी यह भूमिका उनका सर्वाधिक मशहूर स्क्रीन इमेज बन गई। 1960 और 1970 के दशकों में ललिता

बहुधा इस छवि में मिल जाती हैं

ललिता पवार बहुआयामी प्रतिभा संपन्न

अभिनेत्री थीं जो ऐतिहासिक फ़िल्मों के

इतिहास में शामिल हो गईं, पौराणिक फ़िल्मों संग देवी-देवताओं की मायावी छवियां रच गईं, हास्य फ़िल्मों की गुदगुदी बन गईं, थ्रिलर फ़िल्मों की सनसनी और सामाजिक फ़िल्मों की सामाजिक छवि बन गईं। ललिता ने हिंदी सिनेमा को अपनी कई यादगार छवियां दीं। ‘जंगली’ में शम्मी कपूर की माँ, ‘श्री 420’ में केला बेचने वाली, ‘ आनंद’ की संवेदनशील
मातृछवि और ‘अनाड़ी’ की गौरव-गुरूर मिसेज डिसूजा को जिसने देखा है वह ललिता पवार को कभी भुला नहीं सकता। ललिता पवार महज एक अभिनेत्री ही नहीं हिंदी सिनेमा के अपने
सात दशक लंबे सफर की गाथा का एक हिस्सा थीं। मुख्य भूमिकायें निभातीं सुंदर अभिनेत्री ही नहीं नारी की तमाम अभिव्यक्तियों को अभिनीत करतीं सह-अभिनेत्री थीं

फ़िल्म ‘अनाड़ी’ (1959) में मिसेज डिसूजा की भूमिका में ललिता ने हिंदी सिनेमा की ईसाई मां की रूपरेखा गढ़ डाली। इस भूमिका ने उन्हें 1959 का सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार भी दिलाया। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1961) भी मिला।


ललिता पवार की मृत्यु 24 फरवरी , 1998 को पुणे में हुई। ललिता पवार ने लगभग 600 फ़िल्मों में काम किया और 'शो मस्ट गो ऑन' की भावना को जिया। फ़िल्म उद्योग ने उन्हें ज्यादा पुरस्कार नहीं दिए और विस्मृत भी कर दिया है, परंतु उनकी जन्मभूमि में उनकी स्मृति में कुछ किया जाना चाहिए।

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