बीआर चोपड़ा
#22april
#05nov
बलदेव राज चोपड़ा (बी आर चोपड़ा)
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🎂जन्म: 22 अप्रैल 1914, राहोन
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 05 नवंबर 2008, जुहू, मुम्बई
बच्चे: रवि चोपड़ा
माता-पिता: Lal Vilayati Raj Chopra, Draupadi Chopra
पोते या नाती: कपिल चोपड़ा, अभय चोपड़ा
भाई: यश चोपड़ा, हीरू जौहर, धर्म चोपड़ा, राज चोपड़ा
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हिन्दी फ़िल्मों के एक निर्देशक और निर्माता थे। उन्हें नया दौर, कानून, वक्त, हमराज़ और 1980 दशक के आखिरी वर्षों में टेलिविजन धारावाहिक महाभारत का निर्माण करने के लिये विशेषकर जाना जाता है। 1998 को उन्हें भारतीय सिनेमा का उच्चतम पुरस्कार दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था।
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📽️निर्माता के रूप में
2006 बाबुल
2003 बाग़बान
1992 कल की आवाज़
1991 प्रतिज्ञाबद्ध
1987 आवाम
1985 तवायफ़
1982 निकाह
1978 पति पत्नी और वो
1977 कर्म
1973 धुंध
1972 दास्तान
1967 हमराज़
1963 गुमराह
1960 कानून
1958 साधना
1957 नया दौर
1956 एक ही रास्ता
1953 शोले
1951 अफ़साना
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जन्म तथा शिक्षा
बी. आर. चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल, 1914 को तत्कालीन पंजाब राज्य के लुधियाना शहर में हुआ था। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में अपनी स्नातकोत्तर की शिक्षा लाहौर के मशहूर 'गवर्नमेंट कॉलेज' में पूरी की थी। इस कॉलेज ने फ़िल्म और साहित्य जगत् को 'बलराज साहनी', 'देवानंद', 'चेतन आनंद' और 'खुशवंत सिंह' जैसी शख्सियतें दी हैं। बी. आर. चोपड़ा बचपन के दिनों से ही फ़िल्म में काम कर शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचना चाहते थे। देश के विभाजन के पश्चात् उनका परिवार दिल्ली आ गया, लेकिन कुछ दिन के बाद बी. आर. चोपड़ा का मन वहाँ नहीं लगा और वह अपने सपनों को साकार करने के लिए दिल्ली से मुम्बई आ गए।
व्यवसाय की शुरुआत
बी. आर. चोपड़ा ने अपने कैरियर की शुरूआत फ़िल्म पत्रकार के रूप में की थी। फ़िल्मी पत्रिका 'सिने हेराल्ड' में वह फ़िल्मों की समीक्षा लिखा करते थे। कुछ ही समय में बी. आर. चोपड़ा ने इस पत्रिका का सारा भार स्वयं उठा लिया और 1947 तक इसे निरंतर चलाया। इसी वर्ष उन्होंने आई. एस. जौहर के साथ मिलकर फ़िल्म 'चांदनी चौक' का निर्माण शुरू किया, लेकिन लाहौर में दंगे भड़कने के कारण उन्हें इस फ़िल्म को बीच में ही बंद करना पड़ा।
फ़िल्म निर्माण
वर्ष 1949 में फ़िल्म 'करवट' से उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल हुई। 1951 में अशोक कुमार अभिनीत फ़िल्म 'अफ़साना' को बी. आर. चोपड़ा ने निर्देशित किया। फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपने पच्चीस सप्ताह पूरे किए और 'रजत जयंती' (सिल्वर जुबली) मनाई। इस फ़िल्म की सफलता के बाद बी. आर. चोपड़ा फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। वर्ष 1955 में उन्होंने 'बी. आर. फ़िल्मस बैनर' का निर्माण किया। इस बैनर तले उन्होंने सबसे पहले फ़िल्म 'नया दौर' का निर्माण किया। फ़िल्म नया दौर के माध्यम से बी. आर. चोपड़ा ने आधुनिक युग और ग्रामीण संस्कृति के बीच टकराव को रूपहले पर्दे पर पेश किया, जो दर्शकों को काफ़ी पसंद आया। फ़िल्म 'नया दौर' ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए और बी. आर. चोपड़ा को आकाश की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया।
सामाजिक फ़िल्में
अपनी इस सफलता के बाद बी. आर. चोपड़ा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक से बढ़कर एक फ़िल्मों का निर्माण कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। इन फ़िल्मों में 'साधना' (1958), 'क़ानून' (1960), 'गुमराह' (1963) और 'हमराज़' (1967) जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल हैं। बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले निर्मित फ़िल्में समाज को संदेश देने वाली होती थीं। साठ के दशक के दौर में निर्मित फ़िल्में संगीत प्रधान हुआ करती थीं। लेकिन बी. आर. चोपड़ा अपने दर्शकों को हर बार कुछ नया देना चाहते थे। इसी बात का ध्यान रखते 1960 में उन्होंने 'क़ानून' जैसी प्रयोगात्मक फ़िल्म का निर्माण किया था। यह फ़िल्म इंडस्ट्री में किया गया एक नया प्रयोग था। जब फ़िल्म का निर्माण बगैर गानों के भी किया गया।
योगदान
बी. आर. चोपड़ा ने अपने भाई और जाने माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा को भी शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचाने में अहम योगदान दिया था। 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'धूल का फूल', 'वक़्त' और 'इत्तफ़ाक' जैसी फ़िल्मों की सफलता के बाद ही यश चोपड़ा फ़िल्म इंडस्ट्री में एक निर्देशक के रूप में स्थापित हुए थे। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोंसले को भी कामयाबी के शिखर पर ले जाने में निर्माता और निर्देशक बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों का अहम योगदान था। पचास के दशक में जब आशा भोंसले को केवल बी और सी ग्रेड की फ़िल्मों मे ही गाने का मौका मिला करता था, उस समय बी. आर. चोपड़ा ने ही आशा भोंसले की प्रतिभा को पहचाना और अपनी फ़िल्म 'नया दौर' में गाने का मौका दिया। यह फ़िल्म आशा भोंसले के सिने कैरियर की पहली सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई।
इस फ़िल्म में मोहम्मद रफी और आशा भोंसले के गाए युगल गीत बहुत लोकप्रिय हुए, जिनमें 'मांग के साथ तुम्हारा', 'उड़े जब जब जुल्फे तेरी' आदि गीत शामिल हैं। फ़िल्म 'नया दौर' की कामयाबी के बाद ही आशा जी को अपनी मंज़िल प्राप्त हुई थी। इसके बाद बी. आर. चोपड़ा ने आशा जी को अपनी और भी कई फ़िल्मों में गाने का मौका दिया। इन फ़िल्मों में 'वक़्त' 'गुमराह', 'हमराज', 'आदमी और इंसान', और 'धुंध' प्रमुख हैं। आशा भोंसले के अलावा पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर को भी हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में बी. आर.चोपड़ा की अहम भूमिका रही है।
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महाभारत सीरियल का निर्माण का श्रेय भी चोपड़ा जी का ही बनता है।।
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स्वास्थ्य खराब रहने के कारण अस्सी के दशक में बी. आर. चोपड़ा ने फ़िल्मों का निर्माण करना कुछ कम कर दिया। इस दौरान 1980 में उन्होंने 'इंसाफ का तराजू' और 'निकाह' 1982 का निर्माण किया। वर्ष 1985 में बी. आर .चोपड़ा ने दर्शकों की रग को पहचानते हुए छोटे पर्दे की ओर भी रुख़कर लिया। दूरदर्शन के इतिहास में अब तक सबसे ज़्यादा कामयाब रहे सीरियल 'महाभारत' के निर्माण का श्रेय भी बी. आर. चोपड़ा को ही जाता है। 96 प्रतिशत दर्शकों तक पहुँचने के साथ ही इस सीरियल ने अपना नाम 'गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में भी दर्ज कराया। बी. आर. चोपड़ा के लिए यह 🇮🇳 भारत के लिए एक महान् उपलब्धि थी।
पुरस्कार व सम्मान
बी. आर. चोपड़ा को प्राप्त हुए सम्मान पर यदि गौर किया जाए तो उन्हें 1998 में हिन्दी सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क़ानून' के लिए वह सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' से सम्मानित किए गए थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बी. आर. चोपड़ा ने फ़िल्म निर्माण के अलावा 'बागवान' और 'बाबुल' की कहानी भी लिखी।
निधन
अपनी निर्मित फ़िल्मों से दर्शको के बीच विशिष्ट पहचान बनाने वाले फ़िल्मकार बी. आर. चोपड़ा ने 05 नवम्बर, 2008 को इस दुनिया को अलविदा कर दिया।
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